बिली मिल्स उन चुनिंदा लोगो में से हैं, जिन्होने कभी अपनी प्रतिष्ठा, चरित्र और स्वाभिमान पर आंच नहीं आने दी. विपरीत परिस्थितियो के बावजूद उन्होने न केवल ओलिंपिक में पुरुषो की 10,000 मीटर दौड़ का स्वर्ण पदक जीता, बल्कि 50 साल की उम्र के बाद भी गरीबी से लड़ने का अभियान चलाया और अमेरिकी युवाओं को सपनो की ताकत पर भरोसा करने के लिए प्रेरित किया.
बिली मिल्स का जन्म 30 जून, 1938 को दक्षिण डकोटा के पाइन रिज में हुआ. बिली का बचपन गरीबी में बीता और 12 साल की उम्र में वह अनाथ हो गये. इसके बाद उन्होने अपने जीवन को सकारात्मक रूप से खेल पर फोकस कर दिया.
1950 में उन्हें एथलेटिक स्कॉलरशिप मिली और उन्होने यूनिवर्सिटी ऑफ कंसास ज्वाइन कर लिया. बिली को यहां कई तरह की परेशानियो का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होने हार नहीं मानी. ये चुनौतियां उन्हें आगे की पढ़ाई और 1964 ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने से रोक न सकीं. बिली यह जान चुके थे, कि उनके साथ कोई नहीं है. जो कुछ भी करना है, उन्हें अकेले अपने बल पर करना है. बिल ने एक धावक के रूप में खुद को और तराशने का काम शुरू किया. बिली क्रॉस कंट्री चैंपियनशिप और 1959, 1960 के राष्ट्रीय खेलो में भी विजेता रहे. इस दौरान उन्होने फिजिकल एजुकेशन से बीएस की पढ़ाई भी पूरी कर ली.
कॉलेज के बाद बिली ने यूएस मेरिन कॉर्प्स में बतौर लेफ्टिनेंट ज्वाइन किया. दौड़ के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ था. अपने सपनो को वे कभी नहीं भूले. 1964 के तोक्यो ओलिंपिक खेलो के लिए उन्होंने क्वालीफाइ किया. इसके पहले किसी भी अमेरिकी ने 10,000 मीटर की रेस नहीं जीती थी. बिली पहले अमेरिकी थे, जिन्होने यह कर दिखाया. उस दिन बिली दुनिया के श्रेष्ठ धावक थे. उन्हें अपने पिता का कहा याद आया, बेटा, तुम्हें बिल्कुल गहराई में देखना है, क्रोध से नीचे, ईष्र्या से नीचे, अहंकार से नीचे तुम्हें अपने सपनो को ढूंढ़ना है, क्योकि सपने ही हैं, जो तुम्हें ताकत देंगे.
बिली की जीत ने ओलिंपिक के इतिहास को बदल दिया. 1983 में बिली पर हॉलीवुड में ’रनिंग ब्रेव’ नाम से फिल्म भी बनी. बिली मिल्स क्रिश्चयन रिलीफ सर्विस के प्रवक्ता बन गये. बिली ने गरीब बच्चो की सेवा करने का संकल्प लिया. उन्हें पता था कि गरीबी और तिरस्कार से मन कितना टूट जाता है. वे गरीब बच्चो को टूटने नहीं देना चाहते थे. उन्होने देश के युवाओं को भी प्रेरित करने का काम किया. किताबें भी लिखीं. एक साक्षात्कार में उन्होने कहा कि केवल एक क्षण, जब मैं ओलिंपिक में फिनिश लाइन पर पहुंचा, मेरी जिंदगी बदल गयी. 2003 में कंसास यूनिवर्सिटी ने उनके नाम से स्कॉलरशिप भी शुरू की.
एक गरीब और अनाथ बच्चा अगर यहां तक पहुंच पाया, तो अपने सपनो के कारण. उसने एक सपना देखा और बगैर किसी निराशा के उसे पूरा भी किया. जो लोग सपने देखने का साहस करते हैं, उनके पास जीतने के लिए पूरी दुनिया होती है.
बात पते की
सपने हमें निराशा से लड़ने का ताकत देते हैं.
सपनो पर विश्वास करें और परेशानियो से घबराएं नहीं.
आपके पास अपने सपनो की जितनी स्पष्ट तसवीर होगी, उसके बारे में आप उतने ही ज्यादा उत्साहित होगे
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