चेतन भगत ने अपने एक लेख में कहीं लिखा था कि हर इनसान के पास दो ही विकल्प होते हैं. या तो वह वही काम करे, जिसमें उसका मन लगता हो या फिर जो काम कर रहा है, उसी में मन लगाने की कोशिश करें. आपने अक्सर देखा होगा कि हम उस काम को ज्यादा बेहतर कर पाते हैं, जिसमें हमारा दिल लगता है और उस काम को बड़े अनमने ढंग से करते हैं, जिसमें हमारा दिल न लगता हो.
अगर आप अभी उस दौर में हैं, जहां आपको अपने कैरियर का चयन करना है, तो वही काम चुनें, जिसमें आपका मन लगता हो और नहीं, तो जो काम कर रहे हैं, उसमें मन लगाना शुरू कर दें, अन्यथा आप भी भीड़ का एक हिस्सा बन कर रह जायेंगे.
स्वामी सहजानंद के भक्तों में एक दरजी भी था. वह रोज अपने काम से समय निकाल कर उनका प्रवचन सुनने जाया करता था. एक दिन उसने सोचा कि क्यों न अपने गुरु को कोई उपहार दिया जाये. उसने बड़ी मेहनत से एक अंगरखा तैयार किया. फिर बहुत सकुचाते हुए स्वामी जी को वह अंगरखा भेंट करने पहुंचा. जब वह वहां पहुंचा तो राज्य के राजा भी अपने मंत्रियों के साथ वहां स्वामी जी के दर्शन करने पहुंचे हुए थे. दर्जी बाहर ही इंतजार करने लगा, लेकिन स्वामी जी ने उसे देख लिया और अपने पास बुला लिया. दर्जी अंगरखा लेकर गया और उसने स्वामी जी को प्रणाम कर वह अंगरखा उनके चरणों में रख दिया. सभी लोग अंगरखा देखकर चकित रह गये.
इतनी सुंदर कारीगरी उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी. उसे देख कर राजा की आंखें भी फटी रह गयीं. उन्होंने कहा- क्या तुम मेरे लिए भी बिल्कुल ऐसा ही अंगरखा बना सकते हो? दर्जी ने कहा-नहीं.
दर्जी का जवाब सुन कर मंत्रियों की भौंहें तन गयीं, लेकिन राजा ने सहज भाव से पूछा- ऐसा क्यों? दर्जी बोला-राजन, बिल्कुल ऐसा ही अंगरखा बनाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है, क्योंकि मेरे रोम-रोम में गुरु देव के प्रति जो प्रीति रही है, वैसी प्रीति मैं आपके अंगरखे में नहीं ला सकता. वैसे मैं आपके लिए भी अंगरखा बना सकता हूं, पर वह ऐसा ही होगा, नहीं कह सकता. राजा ने दर्जी की बेबाकी की तारीफ की.
बात पते कीः
-जब तक आप अपने काम में मन से नहीं जुड़ेंगे, तब तक आप अपना बेस्ट नहीं दे पायेंगे.
-अगर आप अपने काम में मन लगाने में नाकाम रहते हैं, तो आपको भीड़ का हिस्सा बनने से कोई नहीं रोक सकता.
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