अक्सर ऑफिस के सीनियर अपने जूनियर के सामने काफी गंभीर रहते हैं. यहां तक तो ठीक है, लेकिन कई बार वे खुद को उनका भगवान मानने लगते हैं. उन्हें लगता है कि मैं ही इनका सब कुछ हूं. इसलिए मन में ही एक सीमा तय कर लेते हैं, कि जूनियर के सामने इतना ही बोलना है, इतना ही सुनना है और इतना ही करना है. यह सीमा जूनियर और सीनियर के बीच की दूरियों को बढ़ाने का काम करती है.
यह याद रखना चाहिए कि जिस तरह हमें कोई चीज अच्छी या बुरी लगती है, वैसी ही दूसरों को भी लगती होगी और एक इनसान होने के नाते हमारी जरूरतें भी बहुत अलग नहीं हैं. कोशिश करें कि अपने कर्मचारियों के साथ मित्रवत व्यवहार रखें, उनकी जरूरतें समझें और अपनी अपेक्षाओं के बारे में उन्हें खुल कर बतायें. आप देखेंगे कि उनके आउटपुट पर भी काफी फर्क पड़ेगा.
एक बार गरमी के मौसम में एक मजदूर को एक सेठ की दुकान पर बहुत भारी सामान लेकर जाना था. बेचारे मजदूर का चिलचिलाती गरमी में बुरा हाल हो रहा था. काफी देर चलने के बाद आखिर दुकान आ गयी. सारा सामान उतारने के बाद मजदूर को कुछ राहत मिली. वह बुरी तरह थक चुका था और उसे जोरों की प्यास लगी थी. उसने सेठ से कहा, ‘‘सेठजी थोड़ा पानी पिला दो.’’
सेठ आराम से अपनी गद्दी पर बैठे ठंडी हवा का आनंद उठा रहे थे. उन्होंने इधर-उधर देखा और अपने नौकर को आवाज लगायी. काफी देर तक नौकर नहीं आया. मजदूर ने फिर कहा, ‘‘सेठजी पानी पिला दो.’’ सेठ ने कहा, ‘‘रुको अभी, मेरा आदमी आये, तो तुम्हें पानी पिलायेगा.’’ कुछ और समय बीता. बार-बार मजदूर की नजर मटके पर जा रही थी..प्यास से बेहाल उसने अपने सूखे होठों पर जुबान फेरते हुए कहा, ‘‘सेठजी बहुत प्यास लगी है, पानी पिला दो.’’ सेठ झल्ला कर उसे डांटने लगे..‘‘थोड़ा रुक जाओ न, अभी मेरा आदमी आयेगा और पिला देगा तुझे पानी.’’ प्यास से बेहाल मजदूर बोला, ‘‘सेठजी कुछ समय के लिए आप ही ‘आदमी’ बन जाओ न.’’
- बात पते की* पहले से ही यह तय कर न रखें कि आपको कर्मचारियों के साथ इतना ही बोलना है, इतना ही सुनना है. खुल कर बात करें उनसे.
* अपने कर्मचारियों के साथ मित्रवत व्यवहार रखें. आउटपुट पर इसका सीधा फर्क आप देखेंगे.
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