चूड़ामणि नाम का एक भोलाभाला गरीब आदमी था. खुद के लिए बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी जुटा पाता था. एक दिन चूड़ामणि ने विचार किया की उसे अब जंगल में जाकर तप करना चाहिए. शायद उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान धन दे दें. वह घनघोर जगल में गया और तपस्या करने लगा.
एक दिन सोते समय भगवान ने स्वप्न में उससे कहा, ‘बेटा, मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही प्रसन्न हूं. तुम यह तपस्या किसलिए कर रहे हो, मैं अच्छी तरह जानता हूं. अब तुम तपस्या छोड़ कर अपने घर लौट जाओ. घर जाते समय रास्ते में तुम्हें वट का एक विशाल वृक्ष मिलेगा. वहां तुम पहले अपना मुंडन कराना, फिर उस पेड़ के पास जाना. उस पेड़ के नीचे तुम्हें एक साधु बाबा तपस्या करते हुए मिलेंगे. पहले डंडे से उनकी खूब पूजा-अर्चना करना और इतनी धुनाई करना की वे बेहोश हो जायें. तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी और तुम खूब धनवान व्यक्ति हो जाओगे.’ इतना सुनते ही चूड़ामणि की नींद खुल गयी और वह बहुत ही बेसब्री के साथ सुबह होने का इंतजार करने लगा. चूड़ामणि ने ठीक वैसे ही किया, जैसा भगवान ने उसे स्वप्न में कहा था. वह अपने घर लौट गया. उसे पेड़ के नीचे तपस्या करता हुआ एक साधु दिखा. उसने डंडे से उस साधु की खूब धुनाई की. देखते ही देखते वह साधु एक सोने के कलश के रूप में बदल गया. चूड़ामणि की यह सारी क्रिया दूर से मोहल्ले का हरिराम देख रहा था. उसने सोचा कि वह भी किसी साधु की डंडे से खूब धुनाई करेगा और वह साधु भी सोने के कलश के रूप में बदल जायेगा और देखते ही देखते वह भी चूड़ामणि की तरह धनवान व्यक्ति बन जायेगा. उसने ल? खरीदा. रास्ते में उसे एक साधु दिख गया तो हरिराम ने ल? से उस साधु की जोरदार धुनाई कर दी. उस साधु के प्राण पखेरू उड़ गये. राज्य के सैनिकों ने हरिराम को हत्या के जुर्म में बंदी बना कर जेल में पहुंचा दिया.
जब हम प्रतियोगी संस्थानो की पहल को अपने संस्थान में लागू करते हैं, तो अक्सर इस पर विचार नहीं करते कि अपने संस्थान के लिए यह पहल कितनी लाभदायक होगी. कई बार तो इसे लागू करने की जरूरत और सही समय के बारे में भी नहीं सोचते. दूसरो की पहल को सिर्फ इसलिए लागू करना चाहते हैं, क्योकि उन्होने ऐसा किया है. अगर हम आंखें मूंद कर यह मान लें कि हमारा प्रयास सबसे अच्छा है और इससे संस्थान को बहुत फायदा होगा, तो सिवाय नुकसान के हमारे हाथ कुछ नहीं आयेगा. यह बिल्कुल वैसा ही है, कि हमने एक बहुत स्वादिष्ट व्यंजन बना लिया, बिना इस बात की परवाह किये कि यह खानेवाले को अच्छा लगेगा या नहीं और फिर जबरदस्ती खिलाने भी लगे. इसलिए जब कोई पहल करनी हो, तो सबसे पहले दो बातो पर विचार करना चाहिए. पहला, क्या यह पहल हमारे संस्थान को फायदा पहुंचा सकती है और दूसरा, क्या यह सही समय है.
बात पते की
-प्रतियोगी संस्थानो की पहल को कई बार हम बिना सोच-विचार के ही अपने संस्थान में लागू कर देते हैं.
-हम यह पहले ही मान लेते हैं कि हमारा प्रयास अच्छा होगा.
-बिना विचार किये संस्थान के लिए कोई भी पहल न करें
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