Saturday, 22 September 2012

छोटी-छोटी रुकावटों से कार्य की दिशा न बदलें

आज युवा पीढ़ी तेजी से सफलता प्राप्त करना चाहती है. ज्यादातर युवाओं को इतनी जल्दी होती है कि वे एक ही काम में लगातार प्रयास को महत्व ही नहीं देते हैं. उन्हें लगता है कि तुरंत अगर सफलता न मिली, तो दूसरा काम शुरू करो, नहीं तो कैरियर की रेस में पिछड़ जायेंगे.

दूसरे काम में भी आशा अनुरूप सफलता नहीं मिली तो वे तीसरा काम पकड़ लेते हैं. इसी तरह से अपने काम बदलते रहते हैं. कुछ लोग काम बदल कर सफल भी होते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग थक कर हार जाते हैं. बहुत सारी उपलिब्धयां एक साथ पाने की चाहत अथवा एक कार्य से शीघ्रता शीघ्र फल की चाह व्यक्ति में बेहद तनाव पैदा कर देती है, जिससे कार्यक्षमता हो जाती है. एक बार एक राजा को अपने लिए एक अतिविश्वसनीय सेनापति की जरूरत थी. उसने चार योग्य पुरुषों का चयन किया. उन्हें महल के कुएं से पानी लाकर एक ड्रम भरने का काम दिया. इसके लिए उन्हें बांस की बेंत से बनी बाल्टी दी गयी. जब कुएं से पानी खींचा जाता, तो बाल्टी ऊपर आते तक उसमें केवल दो चुल्लू पानी रह जाता था, वह भी 2-4 कदम चलने पर रिस जाता था. पहले व्यक्ति ने 10-12 बार प्रयास किया और यह कह कर बैठ गया कि राजा ने असंभव कार्य दिया है.

दूसरा व्यक्ति आधा घंटे तक प्रयास करते रहा और उसे भी पहले व्यक्ति की बात सही लगने लगी. तीसरे और चौथे व्यक्ति लगातार प्रयास करते रहे. लगातार प्रयास से कुएं से लगभग 40-50 कदम तक चलने पर बाल्टी खाली हो जाती थी. सैकड़ों बार के प्रयास के बाद तीसरे व्यक्ति ने भी हिम्मत छोड़ दी. वह अन्य दो के पास बैठ गया. चौथे व्यक्ति ने प्रयास नहीं छोड़ा. उसे विश्वास था कि राजा ने संभव कार्य दिया है.

लगातार करने से ही सफलता मिलेगी. दोपहर बाद उसने देखा कि बांस की बेंत फूलने लगी है और छोटे छिद्र बंद होते जा रहे हैं और पानी ज्यादा दूरी तक ले जाया जा सकता है. शाम होते तक बांस की बेंत फूल गयी और पानी का रिसना बहुत कम हो गया. उस बाल्टी से कुछ पानी ड्रम में डाला जा सका. रात होते तक पानी का ड्रम भर गया और उस चौथे व्यक्ति को राजा द्वारा सेनापति नियुक्त कर दिया गया.

जरूरतें समझें और अपेक्षाओं पर खुल कर बात करें


अक्सर ऑफिस के सीनियर अपने जूनियर के सामने काफी गंभीर रहते हैं. यहां तक तो ठीक है, लेकिन कई बार वे खुद को उनका भगवान मानने लगते हैं. उन्हें लगता है कि मैं ही इनका सब कुछ हूं. इसलिए मन में ही एक सीमा तय कर लेते हैं, कि जूनियर के सामने इतना ही बोलना है, इतना ही सुनना है और इतना ही करना है. यह सीमा जूनियर और सीनियर के बीच की दूरियों को बढ़ाने का काम करती है.

यह याद रखना चाहिए कि जिस तरह हमें कोई चीज अच्छी या बुरी लगती है, वैसी ही दूसरों को भी लगती होगी और एक इनसान होने के नाते हमारी जरूरतें भी बहुत अलग नहीं हैं. कोशिश करें कि अपने कर्मचारियों के साथ मित्रवत व्यवहार रखें, उनकी जरूरतें समझें और अपनी अपेक्षाओं के बारे में उन्हें खुल कर बतायें. आप देखेंगे कि उनके आउटपुट पर भी काफी फर्क पड़ेगा.

एक बार गरमी के मौसम में एक मजदूर को एक सेठ की दुकान पर बहुत भारी सामान लेकर जाना था. बेचारे मजदूर का चिलचिलाती गरमी में बुरा हाल हो रहा था. काफी देर चलने के बाद आखिर दुकान आ गयी. सारा सामान उतारने के बाद मजदूर को कुछ राहत मिली. वह बुरी तरह थक चुका था और उसे जोरों की प्यास लगी थी. उसने सेठ से कहा, ‘‘सेठजी थोड़ा पानी पिला दो.’’

सेठ आराम से अपनी गद्दी पर बैठे ठंडी हवा का आनंद उठा रहे थे. उन्होंने इधर-उधर देखा और अपने नौकर को आवाज लगायी. काफी देर तक नौकर नहीं आया. मजदूर ने फिर कहा, ‘‘सेठजी पानी पिला दो.’’ सेठ ने कहा, ‘‘रुको अभी, मेरा आदमी आये, तो तुम्हें पानी पिलायेगा.’’ कुछ और समय बीता. बार-बार मजदूर की नजर मटके पर जा रही थी..प्यास से बेहाल उसने अपने सूखे होठों पर जुबान फेरते हुए कहा, ‘‘सेठजी बहुत प्यास लगी है, पानी पिला दो.’’ सेठ झल्ला कर उसे डांटने लगे..‘‘थोड़ा रुक जाओ न, अभी मेरा आदमी आयेगा और पिला देगा तुझे पानी.’’ प्यास से बेहाल मजदूर बोला, ‘‘सेठजी कुछ समय के लिए आप ही ‘आदमी’ बन जाओ न.’’

- बात पते की* पहले से ही यह तय कर न रखें कि आपको कर्मचारियों के साथ इतना ही बोलना है, इतना ही सुनना है. खुल कर बात करें उनसे.
* अपने कर्मचारियों के साथ मित्रवत व्यवहार रखें. आउटपुट पर इसका सीधा फर्क आप देखेंगे.

यह न सोचें कि आपके साथ वाले कहां से कहां पहुंच गये

कल्पना करें कि आप व्यस्त ट्रैफिक में सड़क के बीच बाइक पर हैं और बाइक खराब हो गयी. उस वक्त जिस तेजी से बाकी गाड़ियां आपको भागती नजर आती हैं, उससे दिल में बेचैनी बढ़ जाती है. लगता है वे तो मंजिल तक पहुंच जायेंगे और आप कितना पीछे रह गये.

कुछ ऐसी ही बेचैनी कई बार लोगों को अपने कैरियर को लेकर होती है. उन्हें लगता है कि कैरियर की रेस में वे काफी पीछे रह गये हैं और उनके साथ के लोग काफी आगे निकल
गये हैं.

पिछले दिनों लंबे समय बाद कॉलेज के एक मित्र के घर जाना हुआ. वह सरकारी अधिकारी हैं. ठीक-ठाक पैसे मिलते हैं, लेकिन अपनी नौकरी से संतुष्ट नहीं हैं. मैंने पूछा कैसी चल रही है जिंदगी, तो उसने कहा- बस ये समझ लो कि चल रही है. मेरे साथ के लोग आज कहां से कहां पहुंच गये, लेकिन मैं यहीं रह गया. मैंने जिसे सिखाया आज वो मुझसे ज्यादा कमा रहा है. और कल्पेश की तो ैजैसे लॉटरी ही लग गयी.

लाखों में खेल रहा है बंदा. मैं जितनी देर उसके पास रहा, उसने अपने बारे में तो कम ही बातें की, लेकिन दूसरों की बेहतर स्थिति का रोना जरूर रोता रहा. यह स्थिति मैंने कइयों के साथ देखी है. शायद ही कोई ऐसा मिला हो, जो अपनी स्थिति से खुश हो. सभी को यही लगता है कि जिंदगी का सारा संघर्ष उन्हीं के खाते में है और लॉटरी उनके साथवालों की लग गयी है.

हमें खुद से बेहतर करनेवालों की तरफ जरूर देखना चाहिए, लेकिन इस नजरिये से नहीं कि मैं वहीं रह गया और वह वहां पहुंच गया, बल्कि इस नजर से देखना चाहिए कि आप कैसे उनसे आगे पहुंच सकते हैं. आप मानें न मानें, लेकिन जब आप यह कहते हैं कि आपके साथवाला कहां से कहां पहुंच गया और आप वहीं रह गये, तो इसका मतलब है कि आप उससे ईर्ष्या करते हैं और अगर ईर्ष्या रहेगी, तो आपकी ऊर्जा का रुख नकारात्मक होगा. इसलिए ऐसा कहना छोड़ें और अपनी बातों में, अपने व्यवहार में सिर्फ खुद के आगे बढ़ने के लिए रास्ता तलाशें, अन्यथा आप खुद को बीच ट्रैफिक में ही खड़े पायेंगे और बाकी लोग आपसे बहुत आगे निकल जायेंगे.

बात पते कीः
-अपनी बातों में, अपने व्यवहार में सिर्फ खुद के आगे बढ़ने के लिए रास्ता तलाशें.
-हमें खुद से बेहतर करनेवालों की तरफ जरूर देखना चाहिए, लेकिन इस नजरिये से कि आप वहां तक कैसे पहुंच सकते हैं.

दबाव में ही छिपा है तरक्की का रास्ता

क्या आपने कभी सोचा है कि दिनभर इतनी भागदौड़ क्यों कर रहे हैं? नौकरी में इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं (अगर कर रहे हों तो)? क्यों अपने सपनों को पूरा करने के लिए कड़ी से कड़ी मेहनत करने को तैयार रहते हैं? इसके कई जवाब हो सकते हैं. लेकिन गौर करें, तो पता लगता है कि जीवन में गति के लिए, आगे बढ़ने के लिए एक प्रेशर चाहिए.

एक इंसपीरेशन चाहिए. अब तो इस बात को विज्ञान भी स्वीकार करता है. आपकी जिंदगी में कई तरह के प्रेशर हैं, जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं. और इनमें सबसे महत्वपूर्ण है घर-परिवार का प्रेशर. यह प्रेशर असल में परिवार की आपसे अपेक्षाओं का दबाव है. आप उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए उनके हिस्से का समय भी ऑफिस को दे देते हैं. लेकिन अगर ऑफिस में आप अपना काम न कर, टाइमपास में लगे हैं या आपकी आदत काम को टालने की है, तो आप ऐसा कर न केवल कंपनी के साथ धोखा कर रहे हैं, बल्कि अपने परिवार, उनकी अपेक्षाओं और अपने सपनों के साथ भी धोखा कर रहे होते हैं.

सोचिए, क्या टाइमपास कर कोई फायदा है. जब आप अपना कीमती समय ऑफिस को दे ही रहे हैं, तो क्यों न उस समय कुछ क्रियेटिव किया जाये, ताकि आपके समय का आपको रिटर्न मिल सके, आप अपने सपनों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ सकें.

ज्यादातर आपके सपने परिवार से प्रेरित होते हैं. आप अपने बीवी-बच्चों, माता-पिता के लिए कुछ विशेष करना चाहते हैं. उनसे बातचीत के दौरान महसूस होता है कि उनकी आपसे खास अपेक्षाएं हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए आपको कैरियर और प्रोफेशनल लाइफ में कुछ नया करना ही होगा. तब आप खुद को मानिसक रूप से तैयार करते हैं और सपनों की नयी दौड़ शुरू हो जाती है. कुछ को लग सकता है कि किसी के सपनों को अपने कंधों पर लादना गलत है, पर यह बात भी सही है कि हम अपने आसपास के वातावरण से ही प्रेरित हो सकते हैं. इसे आप प्रेशर मान सकते हैं, पर यह एक तरह से आपको नयी ऊर्जा, नया सोच दे रहा है. इसलिए यह प्रेशर सभी के लिए अच्छा है. इस दबाव से ही आप तरक्की करेंगे.

बात पते कीः--प्रेशर सभी के लिए अच्छा है. यह आपको आपके कैरियर में नयी ऊर्जा, नया सोच देता है, ताकि आप अपने सपनों को पूरा कर सकें.
-ऑफिस में टाइमपास कर आप न केवल कंपनी के साथ, बल्कि अपने सपनों के साथ भी धोखा कर रहे हैं.

रफ्तार तभी अच्छी लगती है जब उसकी जरूरत हो

आपने गौर किया होगा कि आपके ऑफिस में अक्सर तेज गति से काम निबटा लेने की कला में माहिर लोगों की तारीफ होती है. यह सब देख-सुन कर आपको लगता होगा कि सभी को तेजी से काम निबटाने चाहिए.

एक जमाना था, जब आप-हम हर काम तसल्ली से किया करते थे, पर अब प्रतिस्पर्धा का जमाना है. आगे बढ़ने की होड़ है. इस कंपीटीशन के दौर में जो जितनी जल्दी काम कर रहा है, उसे सफलता का उतना ही बड़ा तमगा दिया जा रहा है. अगर आपको भी अपने जॉब में रफ्तार पसंद है, तो एक सीमा तक तो यह ठीक है, लेकिन यह भी ध्यान रखें कि क्या लांग टर्म में इस रफ्तार से आपको फायदा होगा? कहीं रफ्तार के चक्कर में आप कुछ खो तो नहीं रहे हैं.

अक्सर अपनी नौकरी में रफ्तार के शौकीन चीजों को पूरी तरह से समझ नहीं पाते हैं. सिर्फ टारगेट पूरा करने की ललक रखते हैं, न कि उसे अच्छी तरह से समझने की. उम्मीद रहती है कि वे सफल होंगे, पर हमेशा ऐसा नहीं होता, जैसा आप सोचते हैं. तेजी से काम निबटाने के चक्कर में गलतियां होने की संभावना ज्यादा रहती है. फैसला आपको करना है कि आपकी प्राथमिकता क्या है? ऐसा कैरियर, जिसमें हर काम तेजी से तो पूरा हो रहा हो, पर गड़बड़ियों के साथ या फिर आप सुकून के साथ हर चीज को करना चाहेंगे. रफ्तार भरी जिंदगी में आप किसी चीज की गहराई में जाने की बजाय बस अपने उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं. आपका एकमात्र लक्ष्य यही होता है कि कैसे जल्दी से जल्दी हाथ में आये काम को खत्म किया जाये. इससे आप सूक्ष्मता को नजरअंदाज कर देते हैं, जिसके कारण काम में परफेक्शन नहीं आ पाता.

छोटी-छोटी चीजों पर गौर करने से ही दिमाग का विकास हो पाता है. रफ्तार तभी अच्छी लगती है, जब उसकी जरूरत हो. रफ्तार को आदत बना लेना आपके लिए खतरनाक हो सकता है. समय आपके पास भी दूसरे सभी लोगों के बराबर है. हर पहलू पर विचार करने की आदत डाल लें, तो आपको न तो काम से थकान होगी और न टेंशन.

बात पते कीः-छोटी-छोटी चीजों पर गौर करने से ही दिमाग का विकास हो पाता है. रफ्तार को आदत बना लेना आपके लिए खतरनाक हो सकता है.
-हर पहलू पर विचार करने की आदत डाल लें, तो आपको न तो काम से थकान होगी और न टेंशन.

कर्मचारियों का ध्यान रखें वे अपना बेस्ट जरूर देंगे


कई बार आपने महसूस किया होगा कि कोई व्यक्ति आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ता, लेकिन आपको वह बिल्कुल भी पसंद नहीं आता. वहीं कुछ लोग आपकी बिल्कुल परवाह नहीं करते, लेकिन आपकी नजर में वे आपके करीब हैं.

एक स्टेज तक तो यह ठीक है, लेकिन जब आप एक जिम्मेवारी भरी जगह पर आते हैं, तो आपको सभी के साथ समान रूप से स्नेहमय व्यवहार रखना चाहिए. यह आपकी उदारता और बड़प्पन को बताता है. जब मैं पहली बार किसी ब्रांच का हेड बन कर जा रहा था, तो मेरे बॉस ने मुझसे एक ही बात कही- वहां जाते ही सेकेंड इंचार्ज से लेकर ऑफिस ब्वॉय तक का ध्यान रखना, हमेशा उनका हालचाल लेते रहना, ताकि वे तुम्हें अपने करीब समङों और हमेशा बेस्ट देने की कोशिश करें.

ईश्वरचंद्र विद्यासागर समाज के हर वर्ग के प्रति समान भाव रखते थे. उनके घर में घरेलू कामकाज के लिए एक नौकर था. विद्यासागर उसके प्रति काफी स्नेह रखते थे और उसके साथ बिल्कुल अपने परिवार के सदस्य की तरह ही व्यवहार करते थे. एक दिन वह अपने मकान की सीढ़ियों से उतर रहे थे कि उन्होंने देखा उनका नौकर सीढ़ियों पर ही सो रहा है और उसके हाथ में एक पत्र है.

विद्यासागर ने धीरे से उसके हाथ से पत्र निकाल कर पढ़ा तो उन्हें पता चला कि उसके घर से कोई दुखद समाचार आया था. विद्यासागर ने देखा कि नौकर के चेहरे पर आंसू की एक लकीर थी, शायद वह रोते-रोते सो गया था. वह जल्दी से हाथ वाला पंखा लाकर उसे झलने लगे, ताकि नौकर आराम से सो सके. उसी समय उनका एक मित्र वहां आया. यह दृश्य देख कर वह चकित होकर बोला - आप तो हद कर रहे हैं. सात-आठ रु पये की पगार वाले नौकर की सेवा में लगे हैं.

विद्यासागर ने कहा-मेरे पिताजी भी सात-आठ रु पये मासिक ही पाते थे. मुङो याद है , एक दिन वह चलते-चलते सड़क पर अचेत हो गये थे, तब एक राहगीर ने पानी पिला कर उनकी सेवा की थी. अपने इस नौकर में मैं अपने स्वर्गीय पिता की वही छवि देख रहा हूं. यह दुनिया तभी बेहतर ढंग से चल पायेगी जब हर व्यक्ति एक-दूसरे को अपना समङो और उसकी सहायता करे.

बात पते कीः-
-सभी के साथ समान रूप से स्नेहमय व्यवहार रखना चाहिए. यह आपकी उदारता और बड़प्पन को बताता है.
-अगर आप दिल से अपने कर्मचारियों का ध्यान रखते हैं, तो यकीन मानिए आपके कर्मचारी भी बेस्ट देने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

बिजनेस को नौकरी का विकल्प न मानें

कुछ साल पहले रजनीश अपनी नौकरी से बेहद परेशान था. वह अपने साथियों के बीच बराबर यही कहता था कि कुछ अपना काम-धंधा शुरू किया जाये. इस नौकरी से तो अच्छा है, कि कुछ कम पैसे भी कमा लें, लेकिन संतुष्टि तो होगी, इतना तनाव तो नहीं होगा.

बस कुछ पैसे का इंतजाम हो जाये. संजय उसकी बातें कई दिनों से सुन रहा था. उसने रजनीश से कहा, रजनीश बिजनेस करनेवालों की मानसिकता अलग होती है. वे पैसा जमा होने का इंतजार नहीं करते. उनके पास जो है, वे उसी में काम शुरू कर देते हैं.

विश्वव्यापी मंदी और कॉस्ट कटिंग के इस दौर में आजकल ज्यादातर ऑफिस में ऐसी बातें सुनने को मिल जायेंगी. लोग चाहते हैं कि उनका अपना काम हो. असल में वे चाहते नहीं हैं. यह उनका डर है, जो उन्हें ऐसा सोचने पर मजबूर कर रहा है. उनकी बातों से ऐसा लगता है, जैसे बिजनेस करना बेहद आसान है. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि यह बेहद कठिन है, लेकिन जिस आसानी से हम इसे नौकरी का विकल्प मानने लगते हैं, यह उतना भी आसान नहीं है.

अगर आप वर्तमान नौकरी में अपनी नौकरी बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और इसके तनाव को बरदाश्त नहीं कर पा रहे हैं, तो आप यह कैसे उम्मीद करते हैं कि आप बिजनेस में इन संघर्षो से मुकाबला कर लेंगे. वहां तो आपको नौकरी से ज्यादा संघर्ष करना पड़ेगा. सोचिए, आप अगर कहीं काम कर रहे हैं, तो आप इस बारे में शायद ही सोचते होंगे कि कंपनी में जिसका पैसा लगा है, उसे रिटर्न कैसे और कितना मिलेगा. आपको तो एक काम एसाइन कर दिया गया है और आप वह करते हैं, लेकिन बिजनेस में तो आपको सब कुछ खुद ही देखना है.

बिजनेस के लिए मैं यहां कतई हतोत्साहित नहीं कर रहा हूं, लेकिन नौकरी के विकल्प के रूप में इसे न देखें. बिजनेस तभी शुरू करें, जब आपको लगे कि आप वर्तमान नौकरी से ज्यादा तनाव ले सकते हैं. जिस दिन ऐसा महसूस होगा, उस दिन कुछ खास करने के लिए आप बिजनेस में उतरेंगे और तब सफल होने से कोई रोक भी नहीं सकता, लेकिन फिलहाल वर्तमान नौकरी ही भली. इसी में अपना बेस्ट दें. इस समय कंपनी को भी आपके बेस्ट की सबसे ज्यादा जरूरत है.

ऑफिस पर बोझ हैं ‘बिजी फॉर नथिंग’ लोग


पांच साल पहले मैं जिस कंपनी में काम करता था, वहां एक सुपरवाइजर थे शर्मा जी. शर्मा जी की खासियत थी कि उनके पास कोई काम नहीं होता था, बावजूद इसके कोई भी उन्हें कुछ भी काम बोलता, तो उनका यही जवाब होता था कि अभी बिजी हूं, बाद में देखता हूं. उसके बाद बड़बड़ाते भी कि जिसको देखो, मुझे ही काम बोलता है. हमलोगों ने उनका नाम ‘बिजी फॉर नथिंग’ रख दिया था. ऐसे ‘बिजी फॉर नथिंग’ लोग मुङो हर जगह मिले.

आपके ऑफिस में भी शायद ऐसा कोई ‘बिजी फॉर नथिंग’ होगा. ऐसे लोग हमेशा बिजी रहते हैं. इनके हर अधूरे काम की वजह एक ही होती है कि वे बिजी थे. ऐसे लोगों के लिए बिजी होना एक ऐसा बहाना है, जिसका वे अपनी हर गलत बात, हर गलत आदत की रक्षा में इस्तेमाल करते हैं. वास्तव में बिजी होना और बिजी होने की आदत का शिकार होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं. जो व्यक्ति 10 कामों में से 8 कामों के न होने का कारण अपने को बिजी होना बताये तो समझ लीजिए कि वह कामचोरी कर रहा है और काम करना ही नहीं चाहता. वह व्यक्ति व्यस्त नहीं, व्यस्तता के मनोविकार का शिकार है. आमतौर पर ये अपने दफ्तर पर बोझ होते हैं, क्योंकि ये बेहद अनुत्पादक होते हैं. इन लोगों की नौकरी अगर सीनियर के भरोसे चलती भी रहती है, तब भी बॉस उनसे खुश नहीं रहते, क्योंकि यह बात हमेशा उनके दिलो दिमाग में रहती है कि अमुक व्यक्ति दफ्तर पर बोझ है.

अगर किसी व्यक्ति को अपने अधूरे कामों के लिए बहाने बनाने की आदत हो गयी है तो फिर उसके अंदर का प्रोफेशनलिज्म खत्म हो जाता है. उसकी ग्रोथ रु क जाती है और किसी नौकरी में रहते हुए यह सबसे बुरी स्थिति है कि आपकी उपस्थिति या अनुपस्थिति का कोई असर ऑफिस के काम पर न पड़े. अगर आप भी ‘बिजी फॉर नथिंग’ में से एक हैं, तो थोड़ा समय निकालिए और यह जानिए कि सबसे अहम बात यही है कि अपने प्रोफेशनलिज्म को कायम रखते हुए छोटी-छोटी बातों में बहाने बनाने से बचें और ऑफिस में खुद का महत्व साबित करने के प्रयास में जुट जाएं. यह बहुत मुश्किल नहीं, शुरुआत करके देखें.

बात पते कीः-
-अगर किसी व्यक्ति को अपने अधूरे कामों के लिए बहाने बनाने की आदत है, तो फिर उसके अंदर का प्रोफेशनलिज्म खत्म हो जाता है.
-छोटी-छोटी बातों में बहाने बनाने से बचें और ऑफिस में खुद का महत्व साबित करने के प्रयास में जुट जाएं.

यह कतई न सोचें कि आपके बिना काम नहीं चल सकता


किसी भी प्रोजेक्ट की सफलता या विफलता बहुत हद तक उसके लीडर पर निर्भर करती है. लीडर पर भरोसा करके ही प्रोजेक्ट का दायित्व उसे सौंपा जाता है. संस्थान हमेशा यही चाहता है कि लीडर संस्थान को अपना बेस्ट दे, तो दूसरी ओर टीम के बाकी सदस्य चाहते हैं कि वे अपने लीडर से कुछ न कुछ सीखते रहें. ऐसे में लीडर पर दोहरी जिम्मेवारी होती है. एक तो उसे संस्थान को बेस्ट देना होता है और दूसरा उसे टीम के सदस्यों को बेस्ट देने के लिए प्रेरित करना होता है.

अगर आप एक लीडर हैं और चाहते हैं कि खुद में लीडरशिप क्वालिटी को बनाये रखें, तो आपको अपनी कमियों पर भी गौर करते रहना होगा. आपको दूसरों की अच्छाइयों को उभारना है. हो सकता है कि वाकई आपके टीम मेंबर अच्छा नहीं कर रहे हों, पर यह आपका दायित्व है कि उन्हें प्रेरित करें, उनमें जोश भरें. इसके लिए जरूरी है कि आप अपने दायरे से बाहर निकलें. खुद को दर्पण के सामने रख कर पता करते रहें कि कहीं मैं आत्ममुग्धता का शिकार तो नहीं. दूसरों के काम को रिजेक्ट कर देना दुनिया का सबसे आसान काम है, क्योंकि अगर ठान लिया है आपने कि गलतियां निकालनी हैं, तो हजार कारण मिल जायेंगे.
अपने अच्छे काम के लिए खुद की पीठ जरूर थपथपाएं.

खुद को प्यार करना अच्छा है, लेकिन हमेशा दूसरों को कम आंकना सही नहीं. अगर आप ही सकारात्मक नहीं रहेंगे, तो टीम में आत्मविश्वास कहां से आयेगा. आपको टीम के सदस्यों का सच्चा हितैषी बनना होगा और उनके काम का विश्लेषण ऐसे करना होगा कि आप केंद्र में न रहें, अन्यथा टीम के सदस्य आपके सामने तो आपकी तारीफ करेंगे, लेकिन पीठ पीछे आपकी आलोचना ही करेंगे, जो अंतत: प्रोजेक्ट के लिए अच्छा नहीं होगा. याद रखें कि आप लीडर हैं. आपको हर बाधा को पार करना है.

नौकरी बचाने के चक्कर में न रहें. हमेशा लर्निंग प्रोसेस में रहें. आपसे पहले भी इस टीम को कोई और लीड कर रहा था और आपके बाद भी कोई न कोई लीड करेगा. यह कतई न सोचें कि आपके बिना काम नहीं चल सकता.

बात पते कीः-
-खुद को प्यार करना अच्छा है, लेकिन हमेशा दूसरों को कम आंकना सही नहीं.
-आपको टीम के सदस्यों का सच्चा हितैषी बनना होगा और उनके काम का विश्लेषण ऐसे करना होगा कि आप केंद्र में न रहें.

आपकी सफलता सिर्फ आपकी नहीं है

एक बेहद प्रतिभाशाली युवक ने देश की एक बड़ी कंपनी में मैनेजर पद के लिए आवेदन किया. डायरेक्टर ने जब उस युवक की सीवी देखी, तो शुरू से उसके काफी अच्छे मार्क्स थे.
डायरेक्टर ने उस युवक से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे पढ़ाई का खर्च तुम्हारे पिता देते हैं?’’ युवक ने कहा, ‘‘नहीं, मेरे पिता तभी गुजर गये थे, जब मैं एक साल का था. मेरी मां मेरी फीस जमा करती हैं.’’ डायरेक्टर ने पूछा, ‘‘तुम्हारी मां कहां काम करती हैं?’’ उस युवा ने बताया कि वह कपड़े धोने का काम करती हैं. डायरेक्टर ने उससे पूछा, कि क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपनी मां की मदद की? युवा ने कहा, नहीं. मेरी मां हमेशा यही चाहती थी कि मैं सिर्फ पढ़ाई करूं. डायरेक्टर ने कहा, ‘‘मेरी एक गुजारिश है. आज जब तुम घर जाओ, तो अपनी मां के हाथों को साफ करना और फिर कल सुबह मुझसे मिलना.’’
घर जाकर वह अपनी मां का हाथ साफ करने लगा. मां को आश्चर्य हुआ, लेकिन वह बहुत खुश भी थी. वह जैसे-जैसे मां के हाथों को साफ कर रहा था, वैसे ही वैसे उसकी आंखों से आंसू भी टपक रहे थे. उसने देखा कि उसकी मां के हाथ बिल्कुल सिकुड़ गये हैं. आज पहली बार उसे अहसास हुआ कि यही दो हाथ कपड़े धुल कर उसकी फीस भरते थे और अपनी मां की वजह से ही वह यहां तक पहुंच सका है. हाथ साफ करने के बाद उसने बाकी के बचे कपड़े भी साफ किये.
अगले दिन वह युवा डायरेक्टर के पास गया. डायरेक्टर ने देखा कि उस युवा की आंखें गीली थीं. उसने पूछा, ‘‘कल की घटना को लेकर तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?’’ युवा ने कहा, ‘‘मैंने जाना की प्रशंसा क्या है. मैंने जाना कि कैसे मां के साथ मिलकर काम किया जा सकता है, तभी मुङो यह महसूस हुआ कि उनका काम कितना कठिन है. कल ही मैंने जाना कि संबंधों का क्या महत्व है.’’
डायरेक्टर ने कहा, ‘‘यही बात मैं समझाना चाह रहा था. मैं ऐसे ही व्यक्ति को रखना चाह रहा था, जो दूसरों की सहायता की प्रशंसा कर सके, जो समझ सके कि दूसरे का काम कितना कठिन है. मुङो ऐसा मैनेजर चाहिए था, जिसकी जिंदगी में पैसा ही सब कुछ न हो. मैं तुम्हें मैनेजर पद पर नियुक्त करता हूं.’’

बात पते कीः-
-आपकी सफलता में जिन लोगों का भी योगदान रहे, उन्हें धन्यवाद देना कभी न भूलें.
-हमेशा दूसरों से प्राप्त सहायता की प्रशंसा करें और कभी दूसरे के काम को अपने काम से आसान न समझें.

जरूरी नहीं कि मदद करनेवाला आपका दोस्त ही हो

गरमी से परेशान एक पक्षी ने ठंडे स्थान पर जाने के लिए दक्षिण की ओर उड़ान भरी. वहां काफी ठंड थी. ठंड इतनी जबरदस्त थी कि वह पक्षी नीचे गिर पड़ा और बिल्कुल बर्फ की तरफ जम गया. वह जमीन पर बेहोश पड़ा थी कि एक गाय ने उसके ऊपर गोबर कर दिया. शरीर के ऊपर गोबर पड़ने से पक्षी को गरमाहट का एहसास हुआ. उसे होश आ गया. वह बहुत खुश था और खुशी में उसने चहकना शुरू कर दिया.


पास से एक बिल्ली गुजर रही थी. उसके कानों में भी उस पक्षी की चहचाहट सुनायी दी. उसने इधर-उधर ढूंढ़ना शुरू किया. उसने देखा कि एक पक्षी गाय के गोबर में फंसा है. बिल्ली को देख कर पक्षी को लगा कि वह उसे बचाने आयी है, लेकिन उस बिल्ली ने पहले तो उसे वहां से निकाला और और फिर अपना भोजन बना लिया. इस कहानी से हमें प्रबंधन की तीन महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं, जिनका हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए.

1. अगर आप किसी के कारण मुसीबत में पड़ गये हों, तो यह जरूरी नहीं कि वह आपका दुश्मन ही हो.
2. आपको मुसीबत से निकालनेवाला आपका दोस्त ही हो, यह हमेशा जरूरी नहीं होता.
3. जब आप किसी बड़ी मुसीबत में हों, तो बेहतर है कि चुपचाप अपना मुहं बंद रखें और बेहतर समय का इंतजार करें.

हम भारतीय दिल से बेहद भावुक होते हैं. किसी के द्वारा की गयी थोड़ी-सी मदद से प्रभावित होकर हम उसे पूरी जिंदगी के लिए ही दोस्त मान लेते हैं. इसके विपरीत अगर किसी की लापरवाही या नासमझी के कारण हम परेशानी में पड़ जायें, तो हमारे लिए वह व्यक्ति दुश्मन बन जाता है. दोनों ही स्थितियों में हम बाकी स्थितियों पर विचार नहीं करते.

एक सफल प्रोफेशनल बनना है, तो हमें हमेशा इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि कौन हमारे दोस्त हैं और कौन दुश्मन. कब-कौन दगा दे दे या कब कोई आपके लिए अवसर का दरवाजा खोल दे, आप इसका अनुमान नहीं लगा सकते. इसलिए हमेशा अलर्ट रहें.

बात पते कीः
-किसी के द्वारा की गयी थोड़ी-सी मदद से प्रभावित होकर हम उसे पूरी जिंदगी के लिए ही दोस्त मान लेते हैं.
-कब-कौन दगा दे दे या कब कोई आपके लिए अवसर का दरवाजा खोल दे, इसका अनुमान नहीं लगा सकते. इसलिए अलर्ट रहें.

वही करें, जो दिल करे या जो करते हैं,उसमें दिल लगायें



चेतन भगत ने अपने एक लेख में कहीं लिखा था कि हर इनसान के पास दो ही विकल्प होते हैं. या तो वह वही काम करे, जिसमें उसका मन लगता हो या फिर जो काम कर रहा है, उसी में मन लगाने की कोशिश करें. आपने अक्सर देखा होगा कि हम उस काम को ज्यादा बेहतर कर पाते हैं, जिसमें हमारा दिल लगता है और उस काम को बड़े अनमने ढंग से करते हैं, जिसमें हमारा दिल न लगता हो.


अगर आप अभी उस दौर में हैं, जहां आपको अपने कैरियर का चयन करना है, तो वही काम चुनें, जिसमें आपका मन लगता हो और नहीं, तो जो काम कर रहे हैं, उसमें मन लगाना शुरू कर दें, अन्यथा आप भी भीड़ का एक हिस्सा बन कर रह जायेंगे.

स्वामी सहजानंद के भक्तों में एक दरजी भी था. वह रोज अपने काम से समय निकाल कर उनका प्रवचन सुनने जाया करता था. एक दिन उसने सोचा कि क्यों न अपने गुरु को कोई उपहार दिया जाये. उसने बड़ी मेहनत से एक अंगरखा तैयार किया. फिर बहुत सकुचाते हुए स्वामी जी को वह अंगरखा भेंट करने पहुंचा. जब वह वहां पहुंचा तो राज्य के राजा भी अपने मंत्रियों के साथ वहां स्वामी जी के दर्शन करने पहुंचे हुए थे. दर्जी बाहर ही इंतजार करने लगा, लेकिन स्वामी जी ने उसे देख लिया और अपने पास बुला लिया. दर्जी अंगरखा लेकर गया और उसने स्वामी जी को प्रणाम कर वह अंगरखा उनके चरणों में रख दिया. सभी लोग अंगरखा देखकर चकित रह गये.

इतनी सुंदर कारीगरी उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी. उसे देख कर राजा की आंखें भी फटी रह गयीं. उन्होंने कहा- क्या तुम मेरे लिए भी बिल्कुल ऐसा ही अंगरखा बना सकते हो? दर्जी ने कहा-नहीं.
दर्जी का जवाब सुन कर मंत्रियों की भौंहें तन गयीं, लेकिन राजा ने सहज भाव से पूछा- ऐसा क्यों? दर्जी बोला-राजन, बिल्कुल ऐसा ही अंगरखा बनाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है, क्योंकि मेरे रोम-रोम में गुरु देव के प्रति जो प्रीति रही है, वैसी प्रीति मैं आपके अंगरखे में नहीं ला सकता. वैसे मैं आपके लिए भी अंगरखा बना सकता हूं, पर वह ऐसा ही होगा, नहीं कह सकता. राजा ने दर्जी की बेबाकी की तारीफ की.

बात पते कीः
-जब तक आप अपने काम में मन से नहीं जुड़ेंगे, तब तक आप अपना बेस्ट नहीं दे पायेंगे.
-अगर आप अपने काम में मन लगाने में नाकाम रहते हैं, तो आपको भीड़ का हिस्सा बनने से कोई नहीं रोक सकता.

Tuesday, 18 September 2012

बेहतर रिजल्ट के लिए रखें कर्मचारियो के हितो का ख्याल


दो घनिष्ठ मित्र थे. दोनों खेती का काम करते थे. खेती योग्य भूमि भी दोनों के पास लगभग एक समान थी. एक मित्र ने अपने काम में बहुत उन्नति की तथा बहुत धन अजिर्त किया. वह हमेशा खुश रहता था.
दूसरा मित्र अक्सर दुखी रहा करता था, क्योंकि उसका काम ठीक नहीं चल रहा था. धन की भी हानि हो रही थी. उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्या वजह है कि उसका काम ठीक नहीं चल रहा है, जबकि उसके मित्र का काम बहुत अच्छा चल रहा है.
एक दिन उसने अपने मित्र से उसकी सफलता का  रहस्य पूछा. मित्र ने उत्तर दिया, ‘‘काम करवाते समय तुम अपने श्रमिकों से डांटते हुए कहते हो-जाओ खूब काम करो. इससे उन मजदूरों का मनोबल गिरता है. वे अपने संपूर्ण सामथ्र्य तथा मन से काम नहीं कर पाते.’’ दूसरे मित्र ने पूछा. ‘‘तुम क्या कह कर काम करवाते हो?’’ पहले मित्र ने जवाब दिया-
‘‘मैं अपने श्रमिकों से कहता हूं, आओ हम काम करें. उनका मनोबल बढ़ाते हुए हमेशा उनके साथ रहता हूं.’’ मित्र को सफलता का रहस्य ज्ञात हो गया था.
अगर आप अपने कर्मचारियों से काम लेना चाहते हैं, तो आपको दो बातो का खास ध्यान रखना चाहिए. पहला, बेहतर आउटपुट के लिए कर्मचारियो के हित का ख्याल रखें और उनका मनोबल बढ़ाएं और दूसरा, सहभागिता अपनाएं. कर्मचारियो के हित का ख्याल रखने से न सिर्फ उनका मनोबल बढ़ता है, बल्कि उनको काम में कभी बोरियत या एकरसता महसूस नहीं होती. इतना ही नहीं, परेशानी या मुसीबत आने पर वे आपसे बिना संकोच संपर्क भी करते हैं. कॉरपोरेट संस्कृति में खुल कर बातचीत करना और उपलब्धता बहुत जरूरी है.
एक लीडर के रूप में आपके पास कर्मचारियो को सुनने के लिए समय होना चाहिए. कभी-कभी किसी कर्मचारी की व्यक्तिगत समस्याएं उसके काम पर असर डाल सकती हैं. एक अच्छे लीडर को संवेदनशील, मददगार और जागरूक होना चाहिए. अगर हाल ही में मां बनी महिला काम के घंटों में लचीलापन चाहती है या फिर एक कर्मचारी जो तलाक से जूझ रहा है, वह अपने लिए कुछ वक्त चाहता है, तो उसके प्रति संवेदनशील रुख अपनाइए. कर्मचारियो को यह एहसास दिलाइये कि आप हमेशा उनके साथ हैं. यह लंबे समय में आपके लिए उनकी वफादारी हासिल करने और उनसे बेहतर काम करवाने में मददगार साबित होगा. कार्यस्थल प्रबंधन विशेषज्ञ टोनी विल्सन अपनी किताब ‘जैक एंड द टीम कुडंट सी’ में लिखते हैं कि बॉस के साथ कर्मचारी का रिश्ता उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना पति-पत्नी के साथ का रिश्ता. वैश्विक शोध संगठन गैलप के सवक्षण के अनुसार बॉस अगर खराब है, तो कार्यस्थल पसंद होने के बावजूद कर्मचारी कंपनी में काम करना नहीं चाहते, वहीं कर्मचारियों के नौकरी में टिके रहने की मुख्य वजह बॉस का अच्छा होना है.
बात पते की
-बेहतर आउटपुट के लिए कर्मचारियो के हितो का ख्याल रखते हुए सहभागिता अपनाएं.
-आपके पास कर्मचारियो को सुनने के लिए समय होना चाहिए.
-कर्मचारियो को यह एहसास दिलायें कि आप हमेशा उनके साथ हैं

अवसर का लाभ उठाने के लिए हमेशा सतर्क रहें


एलेक्जेंड्रिया की प्रसिद्ध लाइब्रेरी के जलने के साथ ही वहां रखी सभी पुस्तकें आग की भेंट चढ़ गयीं. एक पुस्तक बचा ली गयी. यह पुस्तक बहुत मूल्यवान नहीं थी, इसलिए कम पढ़े-लिखे एक गरीब ने इसे थोड़े पैसे में खरीद लिया. पुस्तक बहुत रोचक भी नहीं थी, लेकिन पुस्तक के पन्नो के बीच वाकई कुछ रोचक था. पुस्तक के बीच एक पतला सा स्ट्रिप था, जिसमें पारस पत्थर पहचानने का रहस्य था.
पारस पत्थर, पत्थर का एक टुकड़ा होता है, जिसकी खासियत होती है कि वह किसी भी साधारण धातु को शुद्ध सोने में बदल देता है. स्ट्रिप में लिखा था कि यह हजारो पत्थरो के बीच एक होता है, जो दिखने में बिल्कुल आम पत्थर जैसा ही लगता है. उसे पहचानने का एक ही तरीका है कि जहां आम पत्थर ठंडा महसूस होता है, वहीं पारस पत्थर थोड़ा गरम होता है.
उस गरीब व्यक्ति ने अपना कुछ सामान बेचा. उस पैसे से उसने कुछ जरूरी सामान खरीदे और समुद्र किनारे टेंट लगा कर पत्थरो को टेस्ट करना शुरू किया.  वह जानता था कि अगर उसने सामान्य पत्थर उठाया और ठंडा होने के कारण उसे फिर से समुद्र में फेंक दिया, तो हो सकता है कि वही पत्थर बार-बार उसके पास आये. इसलिए जब उसे लगता कि यह पत्थर ठंडा है, तो वह उसे नदी में फेंक देता. वह पूरे दिन यही परीक्षण करता रहा, लेकिन पारस पत्थर उसके हाथ न लगा. वह पत्थर उठाता, ठंडा मिलता और वह उसे नदी में फेंक देता.
ऐसा करते हुए दिन बीत गया, सप्ताह बीता और फिर महीना भी हो गया. वह पत्थर उठाता, पत्थर ठंडा होता और वह उसे नदी में फेंक देता. इसी क्रम में एक दिन दोपहर उसे एक पत्थर मिला, वह थोड़ा गरम था. इससे पहले कि वह यह समझता कि उसे पारस पत्थर मिल गया है, उसने उसे भी नदी में फेंक दिया. उसे पत्थर उठा कर नदी में फेंकने की आदत हो चुकी थी, इसलिए जब उसे पारस पत्थर मिला, तब भी अपनी आदत के अनुसार उसने उसे नदी में फेंक दिया.
ऐसा ही अवसरो के साथ भी होता है. अगर हम सतर्क न रहें, तो हम उसे ऐसे ही जाने देते हैं. दुनिया में अवसरो की कमी नहीं है. हर समय कोई न कोई अवसर आपके द्वार पर खड़ा आपका दरवाजा खटखटा रहा होता है. परंतु उस अवसर का लाभ उठाने के लिए आपको खुद को पूरी तरह तैयार करना होगा. इसके लिए अवसर को देखने में सतर्कता, अवसर को पकड़ने में व्यवहार कुशलता तथा साहस का होना आवश्यक है. डिजरेली का कहना है, ’’जीवन में मनुष्य के लिए सफलता का रहस्य यह है कि अवसर के लिए हमेशा तैयार खड़े रहें, जब अवसर आये, उसे पकड़ लें.’’ कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जिस पर बरसो का भाग्य निर्भर करता है. हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अनुकूल अवसर कुछ क्षणो के लिए ही आता है. यदि उस क्षण में हम चूक जाते हैं, तो हमारे कई साल या महीने बेकार हो जाते हैं. जीवन में फैसला करने का क्षण बहुत छोटा होता है. यदि हम सतर्क रहेंगे, तो सफल अवश्य होगे. सफलता और असफलता के मध्य अंतर बहुत थोड़ा होता है और अंतर करनेवाली बात यही है.
बात पते की
-अवसर का लाभ उठाने के लिए खुद को पूरी तरह तैयार करना होगा.
-अनुकूल अवसर कुछ क्षणो के लिए ही आते हैं.
-फैसला करने का क्षण बहुत छोटा होता है. यदि हम सतर्क रहेंगे, तो हमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता.

जीतने के लिए पूरी दुनिया है सपने तो देखिये


 बिली मिल्स उन चुनिंदा लोगो में से हैं, जिन्होने कभी अपनी प्रतिष्ठा, चरित्र और  स्वाभिमान पर आंच नहीं आने दी. विपरीत परिस्थितियो के बावजूद उन्होने न केवल ओलिंपिक में पुरुषो की 10,000 मीटर दौड़ का स्वर्ण पदक जीता, बल्कि 50 साल की उम्र के बाद भी गरीबी से लड़ने का अभियान चलाया और अमेरिकी युवाओं को सपनो की ताकत पर भरोसा करने के लिए प्रेरित किया.
बिली मिल्स का जन्म 30 जून, 1938 को दक्षिण डकोटा के पाइन रिज में हुआ. बिली का बचपन गरीबी में बीता और 12 साल की उम्र में वह अनाथ हो गये. इसके बाद उन्होने अपने जीवन को सकारात्मक रूप से खेल पर फोकस कर दिया.
1950 में उन्हें एथलेटिक स्कॉलरशिप मिली और उन्होने यूनिवर्सिटी ऑफ कंसास ज्वाइन कर लिया. बिली को यहां कई तरह की परेशानियो का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होने हार नहीं मानी. ये चुनौतियां उन्हें आगे की पढ़ाई और 1964 ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने से रोक न सकीं. बिली यह जान चुके थे, कि उनके साथ कोई नहीं है. जो कुछ भी करना है, उन्हें अकेले अपने बल पर करना है. बिल ने एक धावक के रूप में खुद को और तराशने का काम शुरू किया. बिली क्रॉस कंट्री चैंपियनशिप और 1959, 1960 के राष्ट्रीय खेलो में भी विजेता रहे. इस दौरान उन्होने फिजिकल एजुकेशन से बीएस की पढ़ाई भी पूरी कर ली.
कॉलेज के बाद बिली ने यूएस मेरिन कॉर्प्स में बतौर लेफ्टिनेंट ज्वाइन किया. दौड़ के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ था. अपने सपनो को वे कभी नहीं भूले. 1964 के तोक्यो ओलिंपिक खेलो के लिए उन्होंने क्वालीफाइ किया. इसके पहले किसी भी अमेरिकी ने 10,000 मीटर की रेस नहीं जीती थी. बिली पहले अमेरिकी थे, जिन्होने यह कर दिखाया. उस दिन बिली दुनिया के श्रेष्ठ धावक थे. उन्हें अपने पिता का कहा याद आया, बेटा, तुम्हें बिल्कुल गहराई में देखना है, क्रोध से नीचे, ईष्र्या से नीचे, अहंकार से नीचे तुम्हें अपने सपनो को ढूंढ़ना है, क्योकि सपने ही हैं, जो तुम्हें ताकत देंगे.
बिली की जीत ने ओलिंपिक के इतिहास को बदल दिया. 1983 में बिली पर हॉलीवुड में ’रनिंग ब्रेव’ नाम से फिल्म भी बनी. बिली मिल्स क्रिश्चयन रिलीफ सर्विस के प्रवक्ता बन गये. बिली ने गरीब बच्चो की सेवा करने का संकल्प लिया. उन्हें पता था कि गरीबी और तिरस्कार से मन कितना टूट जाता है. वे गरीब बच्चो को टूटने नहीं देना चाहते थे. उन्होने देश के युवाओं को भी प्रेरित करने का काम किया. किताबें भी लिखीं. एक साक्षात्कार में उन्होने कहा कि केवल एक क्षण, जब मैं ओलिंपिक में फिनिश लाइन पर पहुंचा, मेरी जिंदगी बदल गयी. 2003 में कंसास यूनिवर्सिटी ने उनके नाम से स्कॉलरशिप भी शुरू की.
एक गरीब और अनाथ बच्चा अगर यहां तक पहुंच पाया, तो अपने सपनो के कारण. उसने एक सपना देखा और बगैर किसी निराशा के उसे पूरा भी किया. जो लोग सपने देखने का साहस करते हैं, उनके पास जीतने के लिए पूरी दुनिया होती है.

बात पते की
सपने हमें निराशा से लड़ने का ताकत देते हैं.
सपनो पर विश्वास करें और परेशानियो से घबराएं नहीं.
आपके पास अपने सपनो की जितनी स्पष्ट तसवीर होगी, उसके बारे में आप उतने ही ज्यादा उत्साहित होगे



परख कर करें पहल, नक़ल में न लगायें अकल


 चूड़ामणि नाम का एक भोलाभाला गरीब आदमी था. खुद के लिए बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी जुटा पाता था. एक दिन चूड़ामणि ने विचार किया की उसे अब जंगल में जाकर तप करना चाहिए. शायद उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान धन दे दें. वह घनघोर जगल में गया और तपस्या करने लगा.
एक दिन सोते समय भगवान ने स्वप्न में उससे कहा, ‘बेटा, मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही प्रसन्न हूं. तुम यह तपस्या किसलिए कर रहे हो, मैं अच्छी तरह जानता हूं. अब तुम तपस्या छोड़ कर अपने घर लौट जाओ. घर जाते समय रास्ते में तुम्हें वट का एक विशाल वृक्ष मिलेगा. वहां तुम पहले अपना मुंडन कराना, फिर उस पेड़ के पास जाना. उस पेड़ के नीचे तुम्हें एक साधु बाबा तपस्या करते हुए मिलेंगे. पहले डंडे से उनकी खूब पूजा-अर्चना करना और इतनी धुनाई करना की वे बेहोश हो जायें. तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी और तुम खूब धनवान व्यक्ति हो जाओगे.’ इतना सुनते ही चूड़ामणि की नींद खुल गयी और वह बहुत ही बेसब्री के साथ सुबह होने का इंतजार करने लगा. चूड़ामणि ने ठीक वैसे ही किया, जैसा भगवान ने उसे स्वप्न में कहा था. वह अपने घर लौट गया. उसे पेड़ के नीचे तपस्या करता हुआ एक साधु दिखा. उसने डंडे से उस साधु की खूब धुनाई की. देखते ही देखते वह साधु एक सोने के कलश के रूप में बदल गया. चूड़ामणि की यह सारी क्रिया दूर से मोहल्ले का हरिराम देख रहा था. उसने सोचा कि वह भी किसी साधु की डंडे से खूब धुनाई करेगा और वह साधु भी सोने के कलश के रूप में बदल जायेगा और देखते ही देखते वह भी चूड़ामणि की तरह धनवान व्यक्ति बन जायेगा. उसने ल? खरीदा. रास्ते में उसे एक साधु दिख गया तो हरिराम ने ल? से उस साधु की जोरदार धुनाई कर दी. उस साधु के प्राण पखेरू उड़ गये. राज्य के सैनिकों ने हरिराम को हत्या के जुर्म में बंदी बना कर जेल में पहुंचा दिया.
जब हम प्रतियोगी संस्थानो की पहल को अपने संस्थान में लागू करते हैं, तो अक्सर इस पर विचार नहीं करते कि अपने संस्थान के लिए यह पहल कितनी लाभदायक होगी. कई बार तो इसे लागू करने की जरूरत और सही समय के बारे में भी नहीं सोचते. दूसरो की पहल को सिर्फ इसलिए लागू करना चाहते हैं, क्योकि उन्होने ऐसा किया है. अगर हम आंखें मूंद कर यह मान लें कि हमारा प्रयास सबसे अच्छा है और इससे संस्थान को बहुत फायदा होगा, तो सिवाय नुकसान के हमारे हाथ कुछ नहीं आयेगा. यह बिल्कुल वैसा ही है, कि हमने एक बहुत स्वादिष्ट व्यंजन बना लिया, बिना इस बात की परवाह किये कि यह खानेवाले को अच्छा लगेगा या नहीं और फिर जबरदस्ती खिलाने भी लगे. इसलिए जब कोई पहल करनी हो, तो सबसे पहले दो बातो पर विचार करना चाहिए. पहला, क्या यह पहल हमारे संस्थान को फायदा पहुंचा सकती है और दूसरा, क्या यह सही समय है.

बात पते की
-प्रतियोगी संस्थानो की पहल को कई बार हम बिना सोच-विचार के ही अपने संस्थान में लागू कर देते हैं.
-हम यह पहले ही मान लेते हैं कि हमारा प्रयास अच्छा होगा.
-बिना विचार किये संस्थान के लिए कोई भी पहल न करें



बहानेबाजी नहीं, कंपनी को चाहिए रिजल्ट


 बहुत पहले की बात है. एक बार एक लकड़हारा लकड़ी के व्यापारी के पास काम मांगने गया. वह अपने काम में बहुत दक्ष था, इसलिए उसे नौकरी भी तुरंत मिल गयी. व्यापारी ने उसे अच्छी सैलरी पर काम पर रख लिया और काम करने की उसकी शर्ते भी मान लीं. लकड़हारा खुश हुआ. मन ही मन उसने यह सोच लिया था कि वह अपना बेस्ट देगा. व्यापारी ने उसे कुल्हाड़ी देते हुए बताया कि उसे कहां काम करना है. पहले दिन लकड़हारा 18 पेड़ काट कर लाया. व्यापारी बहुत खुश हुआ और उसे बधाई भी दी. बॉस की बातो से लकड़हारा काफी प्रेरित हुआ और अगले दिन यह सोच कर गया कि आज और भी अच्छा काम करेगा. लेकिन दूसरे दिन वह केवल 15 पेड़ ही काट सका. तीसरे दिन उसने और ज्यादा मेहनत की, लेकिन केवल 10 पेड़ ही काट सका. दिन-ब-दिन उसकी क्षमता घटती गयी. लकड़हारे ने सोचा, मेरी क्षमता कम होती जा रही है. वह व्यापारी के पास गया और उससे माफी मांगते हुए कहने लगा कि पता नहीं क्यो ऐसा हो रहा है कि मेरी क्षमता घटती जा रही है. व्यापारी ने उससे एक ही सवाल किया- अंतिम बार तुमने अपनी कुल्हाड़ी में कब धार लगायी थी? लकड़हारा बोला, धार..मेरे पास कुल्हाड़ी में धार लगाने का समय ही नहीं था. मैं तो पेड़ काटने में ही व्यस्त रहा.
जॉब मार्केट में जिस तेजी से बदलाव हो रहे हैं, उसमें आपका अपने क्षेत्र की स्किल्स में अपडेट रहना बेहद जरूरी है. कंपनियां सब कुछ देने के लिए आज तैयार हैं, लेकिन वह परफॉरमेंस से समझौता करना नहीं चाहतीं. बहानेबाजी की कोई जगह नहीं है. कंपनी को आपसे रिजल्ट चाहिए. ज्यादातर फ्रेशर्स को इन सबसे काफी परेशानी होती है. उन्हें लगता है कि उनके सारे सपने इतनी आसानी से पूरे नहीं होगे. कंपनी उनसे ज्यादा से ज्यादा रिजल्ट की उम्मीद करती है, जिससे उन्हें अपनी स्किल्स कम नजर आने लगती हैं. ऐसे में तनाव में आने की बजाय खुद को अपडेट करना ज्यादा जरूरी है.
आज जब चार से पांच साल में पीढ़ियां बदल जाती हैं, तो किसी भी फील्ड में सालों पहले हासिल ज्ञान के बल पर पूरे कैरियर में आप कैसे बेहतर परफॉरमेंस की उम्मीद कर सकते हैं. बेहतर परफॉरमेंस के दबाव को हल्का करने के लिए जरूरी है कि आप अपने नॉलेज और स्किल्स को अपडेट करते रहें, तभी समय की दौड़ में पिछड़ने से भी बचे रहेंगे. लगातार अच्छे परफॉरमेंस के लिए जरूरी है कि आपमें वह स्किल हो, जो कंपनी की जरूरत को पूरी कर सके. चूंकि जरूरत भी बदलती रहती है, इसलिए इस मामले में आपका अपडेट रहना भी जरूरी है. और हां, यह कोई मुश्किल भी नहीं, बस दृष्टिकोण सही हो और मन में सीखने की इच्छा हो।

ध्यान दें
-बेहतर परफॉरमेंस के लिए अपने नॉलेज और स्किल्स को अपडेट
करते रहें.
-समय और जरूरत के अनुसार बदलना जरूरी है और इस बदलाव का दृष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए।