Tuesday, 8 April 2014

बहाने अब बदल दीजिये...

फर्ज कीजिए, आप ऑफिस में काम कर रहे हैं. आपके बगल में आपका कलीग बैठा है. काम के साथ-साथ कुछ मजेदार बातें भी हो रही हैं. फिर अचानक आपका मोबाइल रिंग करता है. दूसरी तरफ आपके बॉस की आवाज आती है. आपसे कहा जाता है कि आपको एक महीने के लिए दूसरे शहर के ब्रांच में काम करना है. वहां आपकी जरूरत है. ऐसे में आपका रिएक्शन क्या होगा? सोच कर ही डर लगता है न. उफ, कैसे होगा मैनेज?
पर कंफर्ट जोन से बाहर आना अब जरूरी है. ज्यादातर लोगों ने अपने आसपास और खुद के अंदर एक दुनिया बना ली है और उन्हें बस इसी दुनिया में रहना अच्छा लगता है. सारी चीजें तय हैं, एक रुटीन बन गया है, जिन्हें बस फॉलो करना है. कुछ नया नहीं, कोई इनोवेशन नहीं, वही पुरानी दुनिया, वही लोग और वही सोच. खुश हैं, क्योंकि सैटिस्फाइड हैं अपनी जिंदगी से. ज्यादा की ख्वाहिश नहीं. वैसे भी अगर जॉब सुकून से चल रहा हो तो वर्कप्लेस पर बदलाव की चर्चा से ही बेचैनी-सी हो जाती है. किसी भी तरह के बदलावों को हमेशा शक की नजर से देखते हैं. बदलाव के अच्छे इफेक्ट हमेशा आंखों से दूर रहते हैं. केवल तुरंत पडऩे वाले इफेक्ट के बारे में सोचते हैं और चीजें हमें कठिन लगने लगती हैं.
मैंने कई ऐसे लोगों को देखा है, जो बदलाव की बात करते ही सबसे पहले उन बदलावों की कमियां निकालने में लग जाते हैं. उनकी पहली कोशिश यही होती है कि किसी भी तरह बदलाव के प्रपोजल को रिजेक्ट कर दिया जाए, ताकि इसके चक्कर में उन्हें न बदलना पड़े. पिछले दिनों मित्र रजनीश से बात हुई. उसने बताया कि उनके संस्थान में अब सारा काम नए सॉफ्टवेयर पर होगा. कंपनी ने इसके पीछे करोड़ों रुपए खर्च किए हैं और बाहर से एक्सपर्ट बुलाकर सभी के लिए वर्कशॉप का आयोजन किया, उसके लिए तीन दिन सुबह दो घंटे जल्दी आना पड़ा. रुटीन ही खराब हो गया. 15 दिन का समय हमें दिया गया है. हम सभी को उस सॉफ्टवेयर की पूरी जानकारी रखनी होगी, ताकि डेली उसका यूज किया जा सके. मैं तो एकदम फ्रस्टेट हो गया हूं. पता नहीं, कंपनी यह सब क्यों कर रही है. सब कुछ ठीक चल रहा था. अब अलग से एक नया काम सीखो. कुछ गलती हो जाए तो बॉस की बात सुनो. बिना मतलब कंपनी ने इतनी बड़ी रकम खर्च दी. अच्छा तो यह होता कि इस रकम को इंप्लाई के बीच इंसेंटिव के रूप में बांट देती.
80 के डिकेड में रजनीश जैसी सोच ही ज्यादातर लोगों की था. यह वह समय था, जब ऑफिसों और कॉरपोरेट कल्चर में तेजी से बदलाव आ रहे थे, वर्कप्लेस पर न्यू टेक्नोलॉजी तेजी से अपनाई जा रही थी. उस वक्त लोगों का पहला सवाल ही यही था कि जब सब कुछ ठीक से चल रहा है तो चेंज की जरूरत ही क्या है? लोग खुद को इनसेक्योर महसूस कर रहे थे. जैसे-जैसे लोगों ने बदलाव के साथ खुद को न्यू टेक्नोलॉजी से अपडेट किया, वैसे-वैसे उनका परफॉरमेंस भी बेहतर होने लगा. हां, उन लोगों को जरूर परेशानी हुई, जो बदलने को तैयार नहींथे. कंपनी यदि ग्रोथ के लिए बदलाव कर रही है तो इंप्लाई का उन बदलावों के प्रति खुद को ढालना उसके अपने ग्रोथ के लिए भी जरूरी है.
दुनिया आज बड़ी तेजी से बदल रही है. एग्जिसटेंश के लिए इनोवेशन अब कंपल्सरी है. इसलिए हर फील्ड में लगातार इनोवेशन हो रहे हैं. इंप्लायर को भी ऐसे लोगों की जरूरत रहती है, जो बदलाव को स्वीकार कर सकेें. इनोवेट कर सकेें, खुद को भी और नए आइडियाज भी. नये-नये बिजनेस और सर्विसेज सामने आ रही हैं, जो हर पल इनोवेशन की डिमांड करती हैं. मतलब हर पल नए आइडियाज. यहां बदलाव का मतलब केवल स्थान परिवर्तन से ही नहींहै. बदलाव अपने अंदर, अपने काम करने के तरीके में और अपनी सोच में बदलाव. थोड़ा कठिन है, लेकिन हर नया बदलाव न केवल आपकी कैपेसिटी बढ़ाता है, बल्कि आपके लिए नए रास्ते भी खोलता है. इसलिए पूरी शिद्दत से स्वीकार करें बदलावों को. क्या पता यह आपकी लाइफ बदल दे. चलते-चलते मंजर भोपाली की यह रचना पढि़ए, शायद यह बदलाव आपको भी पसंद आए.
एक नया मोड़ देते हुए फिर फसाना बदल दीजिये,
या तो खुद ही बदल जाइए या जमाना बदल दीजिये,
तर निवाले खुशामद के जो खा रहे हैं वो मत खाइए,
आप शाहीन बन जायेंगे आब-ओ-दाना बदल दीजिये,
अहल-ए-हिम्मत ने हर दौर मैं कोह (पहाड़पपहाड़) काटे पहैं तकदीर के,
हर तरफ  रास्ते बंद हैं, ये बहाना बदल दीजिये,
तय किया है जो तकदीर ने हर जगह सामने आएगा,
कितनी ही हिजरतें कीजिए या ठिकाना बदल दीजिये,
हमको पाला था जिस पेड़ ने उसके पत्ते ही दुश्मन हुए,
कह रही हैं डालियां, आशियाना बदल दीजिये!

Saturday, 22 September 2012

छोटी-छोटी रुकावटों से कार्य की दिशा न बदलें

आज युवा पीढ़ी तेजी से सफलता प्राप्त करना चाहती है. ज्यादातर युवाओं को इतनी जल्दी होती है कि वे एक ही काम में लगातार प्रयास को महत्व ही नहीं देते हैं. उन्हें लगता है कि तुरंत अगर सफलता न मिली, तो दूसरा काम शुरू करो, नहीं तो कैरियर की रेस में पिछड़ जायेंगे.

दूसरे काम में भी आशा अनुरूप सफलता नहीं मिली तो वे तीसरा काम पकड़ लेते हैं. इसी तरह से अपने काम बदलते रहते हैं. कुछ लोग काम बदल कर सफल भी होते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग थक कर हार जाते हैं. बहुत सारी उपलिब्धयां एक साथ पाने की चाहत अथवा एक कार्य से शीघ्रता शीघ्र फल की चाह व्यक्ति में बेहद तनाव पैदा कर देती है, जिससे कार्यक्षमता हो जाती है. एक बार एक राजा को अपने लिए एक अतिविश्वसनीय सेनापति की जरूरत थी. उसने चार योग्य पुरुषों का चयन किया. उन्हें महल के कुएं से पानी लाकर एक ड्रम भरने का काम दिया. इसके लिए उन्हें बांस की बेंत से बनी बाल्टी दी गयी. जब कुएं से पानी खींचा जाता, तो बाल्टी ऊपर आते तक उसमें केवल दो चुल्लू पानी रह जाता था, वह भी 2-4 कदम चलने पर रिस जाता था. पहले व्यक्ति ने 10-12 बार प्रयास किया और यह कह कर बैठ गया कि राजा ने असंभव कार्य दिया है.

दूसरा व्यक्ति आधा घंटे तक प्रयास करते रहा और उसे भी पहले व्यक्ति की बात सही लगने लगी. तीसरे और चौथे व्यक्ति लगातार प्रयास करते रहे. लगातार प्रयास से कुएं से लगभग 40-50 कदम तक चलने पर बाल्टी खाली हो जाती थी. सैकड़ों बार के प्रयास के बाद तीसरे व्यक्ति ने भी हिम्मत छोड़ दी. वह अन्य दो के पास बैठ गया. चौथे व्यक्ति ने प्रयास नहीं छोड़ा. उसे विश्वास था कि राजा ने संभव कार्य दिया है.

लगातार करने से ही सफलता मिलेगी. दोपहर बाद उसने देखा कि बांस की बेंत फूलने लगी है और छोटे छिद्र बंद होते जा रहे हैं और पानी ज्यादा दूरी तक ले जाया जा सकता है. शाम होते तक बांस की बेंत फूल गयी और पानी का रिसना बहुत कम हो गया. उस बाल्टी से कुछ पानी ड्रम में डाला जा सका. रात होते तक पानी का ड्रम भर गया और उस चौथे व्यक्ति को राजा द्वारा सेनापति नियुक्त कर दिया गया.

जरूरतें समझें और अपेक्षाओं पर खुल कर बात करें


अक्सर ऑफिस के सीनियर अपने जूनियर के सामने काफी गंभीर रहते हैं. यहां तक तो ठीक है, लेकिन कई बार वे खुद को उनका भगवान मानने लगते हैं. उन्हें लगता है कि मैं ही इनका सब कुछ हूं. इसलिए मन में ही एक सीमा तय कर लेते हैं, कि जूनियर के सामने इतना ही बोलना है, इतना ही सुनना है और इतना ही करना है. यह सीमा जूनियर और सीनियर के बीच की दूरियों को बढ़ाने का काम करती है.

यह याद रखना चाहिए कि जिस तरह हमें कोई चीज अच्छी या बुरी लगती है, वैसी ही दूसरों को भी लगती होगी और एक इनसान होने के नाते हमारी जरूरतें भी बहुत अलग नहीं हैं. कोशिश करें कि अपने कर्मचारियों के साथ मित्रवत व्यवहार रखें, उनकी जरूरतें समझें और अपनी अपेक्षाओं के बारे में उन्हें खुल कर बतायें. आप देखेंगे कि उनके आउटपुट पर भी काफी फर्क पड़ेगा.

एक बार गरमी के मौसम में एक मजदूर को एक सेठ की दुकान पर बहुत भारी सामान लेकर जाना था. बेचारे मजदूर का चिलचिलाती गरमी में बुरा हाल हो रहा था. काफी देर चलने के बाद आखिर दुकान आ गयी. सारा सामान उतारने के बाद मजदूर को कुछ राहत मिली. वह बुरी तरह थक चुका था और उसे जोरों की प्यास लगी थी. उसने सेठ से कहा, ‘‘सेठजी थोड़ा पानी पिला दो.’’

सेठ आराम से अपनी गद्दी पर बैठे ठंडी हवा का आनंद उठा रहे थे. उन्होंने इधर-उधर देखा और अपने नौकर को आवाज लगायी. काफी देर तक नौकर नहीं आया. मजदूर ने फिर कहा, ‘‘सेठजी पानी पिला दो.’’ सेठ ने कहा, ‘‘रुको अभी, मेरा आदमी आये, तो तुम्हें पानी पिलायेगा.’’ कुछ और समय बीता. बार-बार मजदूर की नजर मटके पर जा रही थी..प्यास से बेहाल उसने अपने सूखे होठों पर जुबान फेरते हुए कहा, ‘‘सेठजी बहुत प्यास लगी है, पानी पिला दो.’’ सेठ झल्ला कर उसे डांटने लगे..‘‘थोड़ा रुक जाओ न, अभी मेरा आदमी आयेगा और पिला देगा तुझे पानी.’’ प्यास से बेहाल मजदूर बोला, ‘‘सेठजी कुछ समय के लिए आप ही ‘आदमी’ बन जाओ न.’’

- बात पते की* पहले से ही यह तय कर न रखें कि आपको कर्मचारियों के साथ इतना ही बोलना है, इतना ही सुनना है. खुल कर बात करें उनसे.
* अपने कर्मचारियों के साथ मित्रवत व्यवहार रखें. आउटपुट पर इसका सीधा फर्क आप देखेंगे.

यह न सोचें कि आपके साथ वाले कहां से कहां पहुंच गये

कल्पना करें कि आप व्यस्त ट्रैफिक में सड़क के बीच बाइक पर हैं और बाइक खराब हो गयी. उस वक्त जिस तेजी से बाकी गाड़ियां आपको भागती नजर आती हैं, उससे दिल में बेचैनी बढ़ जाती है. लगता है वे तो मंजिल तक पहुंच जायेंगे और आप कितना पीछे रह गये.

कुछ ऐसी ही बेचैनी कई बार लोगों को अपने कैरियर को लेकर होती है. उन्हें लगता है कि कैरियर की रेस में वे काफी पीछे रह गये हैं और उनके साथ के लोग काफी आगे निकल
गये हैं.

पिछले दिनों लंबे समय बाद कॉलेज के एक मित्र के घर जाना हुआ. वह सरकारी अधिकारी हैं. ठीक-ठाक पैसे मिलते हैं, लेकिन अपनी नौकरी से संतुष्ट नहीं हैं. मैंने पूछा कैसी चल रही है जिंदगी, तो उसने कहा- बस ये समझ लो कि चल रही है. मेरे साथ के लोग आज कहां से कहां पहुंच गये, लेकिन मैं यहीं रह गया. मैंने जिसे सिखाया आज वो मुझसे ज्यादा कमा रहा है. और कल्पेश की तो ैजैसे लॉटरी ही लग गयी.

लाखों में खेल रहा है बंदा. मैं जितनी देर उसके पास रहा, उसने अपने बारे में तो कम ही बातें की, लेकिन दूसरों की बेहतर स्थिति का रोना जरूर रोता रहा. यह स्थिति मैंने कइयों के साथ देखी है. शायद ही कोई ऐसा मिला हो, जो अपनी स्थिति से खुश हो. सभी को यही लगता है कि जिंदगी का सारा संघर्ष उन्हीं के खाते में है और लॉटरी उनके साथवालों की लग गयी है.

हमें खुद से बेहतर करनेवालों की तरफ जरूर देखना चाहिए, लेकिन इस नजरिये से नहीं कि मैं वहीं रह गया और वह वहां पहुंच गया, बल्कि इस नजर से देखना चाहिए कि आप कैसे उनसे आगे पहुंच सकते हैं. आप मानें न मानें, लेकिन जब आप यह कहते हैं कि आपके साथवाला कहां से कहां पहुंच गया और आप वहीं रह गये, तो इसका मतलब है कि आप उससे ईर्ष्या करते हैं और अगर ईर्ष्या रहेगी, तो आपकी ऊर्जा का रुख नकारात्मक होगा. इसलिए ऐसा कहना छोड़ें और अपनी बातों में, अपने व्यवहार में सिर्फ खुद के आगे बढ़ने के लिए रास्ता तलाशें, अन्यथा आप खुद को बीच ट्रैफिक में ही खड़े पायेंगे और बाकी लोग आपसे बहुत आगे निकल जायेंगे.

बात पते कीः
-अपनी बातों में, अपने व्यवहार में सिर्फ खुद के आगे बढ़ने के लिए रास्ता तलाशें.
-हमें खुद से बेहतर करनेवालों की तरफ जरूर देखना चाहिए, लेकिन इस नजरिये से कि आप वहां तक कैसे पहुंच सकते हैं.

दबाव में ही छिपा है तरक्की का रास्ता

क्या आपने कभी सोचा है कि दिनभर इतनी भागदौड़ क्यों कर रहे हैं? नौकरी में इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं (अगर कर रहे हों तो)? क्यों अपने सपनों को पूरा करने के लिए कड़ी से कड़ी मेहनत करने को तैयार रहते हैं? इसके कई जवाब हो सकते हैं. लेकिन गौर करें, तो पता लगता है कि जीवन में गति के लिए, आगे बढ़ने के लिए एक प्रेशर चाहिए.

एक इंसपीरेशन चाहिए. अब तो इस बात को विज्ञान भी स्वीकार करता है. आपकी जिंदगी में कई तरह के प्रेशर हैं, जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं. और इनमें सबसे महत्वपूर्ण है घर-परिवार का प्रेशर. यह प्रेशर असल में परिवार की आपसे अपेक्षाओं का दबाव है. आप उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए उनके हिस्से का समय भी ऑफिस को दे देते हैं. लेकिन अगर ऑफिस में आप अपना काम न कर, टाइमपास में लगे हैं या आपकी आदत काम को टालने की है, तो आप ऐसा कर न केवल कंपनी के साथ धोखा कर रहे हैं, बल्कि अपने परिवार, उनकी अपेक्षाओं और अपने सपनों के साथ भी धोखा कर रहे होते हैं.

सोचिए, क्या टाइमपास कर कोई फायदा है. जब आप अपना कीमती समय ऑफिस को दे ही रहे हैं, तो क्यों न उस समय कुछ क्रियेटिव किया जाये, ताकि आपके समय का आपको रिटर्न मिल सके, आप अपने सपनों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ सकें.

ज्यादातर आपके सपने परिवार से प्रेरित होते हैं. आप अपने बीवी-बच्चों, माता-पिता के लिए कुछ विशेष करना चाहते हैं. उनसे बातचीत के दौरान महसूस होता है कि उनकी आपसे खास अपेक्षाएं हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए आपको कैरियर और प्रोफेशनल लाइफ में कुछ नया करना ही होगा. तब आप खुद को मानिसक रूप से तैयार करते हैं और सपनों की नयी दौड़ शुरू हो जाती है. कुछ को लग सकता है कि किसी के सपनों को अपने कंधों पर लादना गलत है, पर यह बात भी सही है कि हम अपने आसपास के वातावरण से ही प्रेरित हो सकते हैं. इसे आप प्रेशर मान सकते हैं, पर यह एक तरह से आपको नयी ऊर्जा, नया सोच दे रहा है. इसलिए यह प्रेशर सभी के लिए अच्छा है. इस दबाव से ही आप तरक्की करेंगे.

बात पते कीः--प्रेशर सभी के लिए अच्छा है. यह आपको आपके कैरियर में नयी ऊर्जा, नया सोच देता है, ताकि आप अपने सपनों को पूरा कर सकें.
-ऑफिस में टाइमपास कर आप न केवल कंपनी के साथ, बल्कि अपने सपनों के साथ भी धोखा कर रहे हैं.

रफ्तार तभी अच्छी लगती है जब उसकी जरूरत हो

आपने गौर किया होगा कि आपके ऑफिस में अक्सर तेज गति से काम निबटा लेने की कला में माहिर लोगों की तारीफ होती है. यह सब देख-सुन कर आपको लगता होगा कि सभी को तेजी से काम निबटाने चाहिए.

एक जमाना था, जब आप-हम हर काम तसल्ली से किया करते थे, पर अब प्रतिस्पर्धा का जमाना है. आगे बढ़ने की होड़ है. इस कंपीटीशन के दौर में जो जितनी जल्दी काम कर रहा है, उसे सफलता का उतना ही बड़ा तमगा दिया जा रहा है. अगर आपको भी अपने जॉब में रफ्तार पसंद है, तो एक सीमा तक तो यह ठीक है, लेकिन यह भी ध्यान रखें कि क्या लांग टर्म में इस रफ्तार से आपको फायदा होगा? कहीं रफ्तार के चक्कर में आप कुछ खो तो नहीं रहे हैं.

अक्सर अपनी नौकरी में रफ्तार के शौकीन चीजों को पूरी तरह से समझ नहीं पाते हैं. सिर्फ टारगेट पूरा करने की ललक रखते हैं, न कि उसे अच्छी तरह से समझने की. उम्मीद रहती है कि वे सफल होंगे, पर हमेशा ऐसा नहीं होता, जैसा आप सोचते हैं. तेजी से काम निबटाने के चक्कर में गलतियां होने की संभावना ज्यादा रहती है. फैसला आपको करना है कि आपकी प्राथमिकता क्या है? ऐसा कैरियर, जिसमें हर काम तेजी से तो पूरा हो रहा हो, पर गड़बड़ियों के साथ या फिर आप सुकून के साथ हर चीज को करना चाहेंगे. रफ्तार भरी जिंदगी में आप किसी चीज की गहराई में जाने की बजाय बस अपने उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं. आपका एकमात्र लक्ष्य यही होता है कि कैसे जल्दी से जल्दी हाथ में आये काम को खत्म किया जाये. इससे आप सूक्ष्मता को नजरअंदाज कर देते हैं, जिसके कारण काम में परफेक्शन नहीं आ पाता.

छोटी-छोटी चीजों पर गौर करने से ही दिमाग का विकास हो पाता है. रफ्तार तभी अच्छी लगती है, जब उसकी जरूरत हो. रफ्तार को आदत बना लेना आपके लिए खतरनाक हो सकता है. समय आपके पास भी दूसरे सभी लोगों के बराबर है. हर पहलू पर विचार करने की आदत डाल लें, तो आपको न तो काम से थकान होगी और न टेंशन.

बात पते कीः-छोटी-छोटी चीजों पर गौर करने से ही दिमाग का विकास हो पाता है. रफ्तार को आदत बना लेना आपके लिए खतरनाक हो सकता है.
-हर पहलू पर विचार करने की आदत डाल लें, तो आपको न तो काम से थकान होगी और न टेंशन.

कर्मचारियों का ध्यान रखें वे अपना बेस्ट जरूर देंगे


कई बार आपने महसूस किया होगा कि कोई व्यक्ति आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ता, लेकिन आपको वह बिल्कुल भी पसंद नहीं आता. वहीं कुछ लोग आपकी बिल्कुल परवाह नहीं करते, लेकिन आपकी नजर में वे आपके करीब हैं.

एक स्टेज तक तो यह ठीक है, लेकिन जब आप एक जिम्मेवारी भरी जगह पर आते हैं, तो आपको सभी के साथ समान रूप से स्नेहमय व्यवहार रखना चाहिए. यह आपकी उदारता और बड़प्पन को बताता है. जब मैं पहली बार किसी ब्रांच का हेड बन कर जा रहा था, तो मेरे बॉस ने मुझसे एक ही बात कही- वहां जाते ही सेकेंड इंचार्ज से लेकर ऑफिस ब्वॉय तक का ध्यान रखना, हमेशा उनका हालचाल लेते रहना, ताकि वे तुम्हें अपने करीब समङों और हमेशा बेस्ट देने की कोशिश करें.

ईश्वरचंद्र विद्यासागर समाज के हर वर्ग के प्रति समान भाव रखते थे. उनके घर में घरेलू कामकाज के लिए एक नौकर था. विद्यासागर उसके प्रति काफी स्नेह रखते थे और उसके साथ बिल्कुल अपने परिवार के सदस्य की तरह ही व्यवहार करते थे. एक दिन वह अपने मकान की सीढ़ियों से उतर रहे थे कि उन्होंने देखा उनका नौकर सीढ़ियों पर ही सो रहा है और उसके हाथ में एक पत्र है.

विद्यासागर ने धीरे से उसके हाथ से पत्र निकाल कर पढ़ा तो उन्हें पता चला कि उसके घर से कोई दुखद समाचार आया था. विद्यासागर ने देखा कि नौकर के चेहरे पर आंसू की एक लकीर थी, शायद वह रोते-रोते सो गया था. वह जल्दी से हाथ वाला पंखा लाकर उसे झलने लगे, ताकि नौकर आराम से सो सके. उसी समय उनका एक मित्र वहां आया. यह दृश्य देख कर वह चकित होकर बोला - आप तो हद कर रहे हैं. सात-आठ रु पये की पगार वाले नौकर की सेवा में लगे हैं.

विद्यासागर ने कहा-मेरे पिताजी भी सात-आठ रु पये मासिक ही पाते थे. मुङो याद है , एक दिन वह चलते-चलते सड़क पर अचेत हो गये थे, तब एक राहगीर ने पानी पिला कर उनकी सेवा की थी. अपने इस नौकर में मैं अपने स्वर्गीय पिता की वही छवि देख रहा हूं. यह दुनिया तभी बेहतर ढंग से चल पायेगी जब हर व्यक्ति एक-दूसरे को अपना समङो और उसकी सहायता करे.

बात पते कीः-
-सभी के साथ समान रूप से स्नेहमय व्यवहार रखना चाहिए. यह आपकी उदारता और बड़प्पन को बताता है.
-अगर आप दिल से अपने कर्मचारियों का ध्यान रखते हैं, तो यकीन मानिए आपके कर्मचारी भी बेस्ट देने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.